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हमारे देश में पेट्रोलियम पदार्थों की मांग दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है जिसके कारण हमारा देश 70 प्रतिशत पेट्रोलियम पदार्थों को अन्य देशों से आयात करता है जिसमें प्रतिवर्ष 1600 बिलियन रुपये खर्च किये जाते हैं जो हमारी देश की आर्थिक स्थिति को कमजोर कर रहे हैं। आज पेट्रो पदार्थों के मूल्य के कारण पूरा विश्व चिंतित है। भारत जैसे विकासशील देश में जहां विकास की गति बढ़ रही है, वहां ऊर्जा की आवश्यकता और ऊर्जा आपूर्ति का प्रश्न देश के लिए अहम हो गया है। अतः हमें चाहिए कि हम हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में अन्य ईंधनों की अपेक्षा बायोडीजल के उत्पादन करने हेतु प्रेरित करें जिससे ग्रामीण रोजगार की समस्या का भी समाधान हो सके और बायोडीजल की उत्पादकता को भी बढ़ाया जा सके।hello ,
बायोडीजल किसे कहते हैं (What is Biodiesel)
बायोडिजल जैविक स्रोतों से प्राप्त तथा डीजल के समतुल्य इंधन है जो परम्परागत डीजल इंजनों को बिना परिवर्तित किये ही चला सकता है। भारत का पहला बायोडीजल संयंत्र आस्ट्रेलिया के सहयोग से काकीनाड़ा सेज (KSEZ) में स्थापित किया गया है
परिचय
बायोडिजल शत्-प्रतिशत नवीनीकरणीय स्रोतों से बनाया जाता है। यह परम्परागत इंधनो का एक स्वच्छ विकल्प है। इसको भविष्य का इंधन माना जा रहा है। बायोडीजल में पट्रोलियम नहीं होता किन्तु इसे सम्यक अनुपात में पेट्रोलियम में मिलाकर विभिन्न प्रकार की गाडियों में प्रयोग किया जा सकता है। बायोडीजल विषैला नही होता; यह बायोडिग्रेडेबल भी है।
बायोडिजल वानस्पतिक तेलों से प्राप्त अन्य वैकल्पिक इंधनों से भिन्न है। बायोडीजल को बिना किसी परिवर्तन किये ही डीजल इंजनों में प्रयोग कर सकते हैं जबकि वनस्पति तेलों से प्राप्त इंधनों को केवल 'इग्निशन कम्बस्शन' वाले इंजनों में ही प्रयोग ला सकते हैं और वह भी कुछ परिवर्तनों के बाद। इस कारण, बायोडिजल प्रयोग में सर्वाधिक आसान इंधनों में से एक है। और सबसे अच्छी बात यह है कि खेती में काम आने वाले उपकरणों को चलाने के लिये सबसे उपयुक्त है।
बायोडिजल जिस प्रक्रिया द्वारा निर्मित किया जाता है उसे ट्रान्स-इस्टरीकरण कहा जाता है। इस प्रक्रिया में वनस्पति तेल या वसा से ग्लीसरीन को निकालना होता है। इस प्रक्रिया में मेथिल इस्टर और ग्लीसरीन आदि सह-उत्पादभी मिलते हैं। बायोडीजल में सल्फर और अरोमैटिक्स नहीं होते जो कि परम्परागत इंधनों में पाये जाते हैं।
बायोडिजल के बारे में सबसे अच्छी बात यह है कि यह दूसरे इंधनों की भांति पर्यावरण के लिये हानिकारक नहीं है। इसके अलावा यह ऐसे स्रोतों से प्राप्त होता है जो पुनः नवीन किये जा सकते हैं। परम्परागत इंधनों की तरह यह प्रदूषण करने वाला धुवां नही पैदा करता।
बायोडीजल बनाने के लिए आवश्यक सामग्री है:- जेट्रोफा तेल, मेथेनोल, सोडियम हाइड्रोक्साइड
बायोडीजल के गुण
1. बायोडीजल के भौतिक और रासायनिक गुण पेट्रोलियम ईंधनों से जरा अलग हैं। यह एक प्राकृतिक तेल है जो परंपरागत वाहनों से इंजन को चलाने में पूर्णतः सक्षम है।
2. इसके प्रयोग से निकलने वाला उत्सर्जन कोई प्रभाव नहीं छोड़ता क्योंकि इसमें धुंआं व गंध न के बराबर है।
3. बायोडीजल पेट्रोल की अपेक्षा जहरीले हाइड्रोकार्बन, कार्बन-मोनोक्साइड, सल्फर इत्यादि से वायु को दूषित नहीं करता है।
4. बायोडीजल स्वास्थ्य और पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित ईंधन है।
5. यह सरल जैव निम्नीकृत, न खत्म होने वाला, स्वच्छ और कार्यदक्ष ऊर्जा स्रोत है।
6. यह जैव ईधन अज्वलनशील होने के कारण सुरक्षित है इसलिए इसके भंडारण और परिवहन में कोई खतरा भी नहीं है।
जैट्रोफा की कृषि विधियां
जैट्रोफा अथवा रतनजोत की विधिवत खेती भारत के मुख्यतः राजस्थान, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश तथा पंजाब राज्यों में की जाती है। संपूर्ण देश में इसकी खेती के लिए भारत सरकार की ओर से कई प्रोत्साहन योजनाएं प्रारंभ की गई हैं एवं इसकी खेती को विशेष बढ़ावा दिया जा रहा है। भारत सरकार, योजना आयोग, तेल मंत्रालय तथा कृषि विभाग इसके तेल को भविष्य के डीजल के रूप में देख रहा है। जैट्रोफा को न सिर्फ बायोडीजल की खेती के रूप में बल्कि और भी कई उपयोगों के लिए उगाया जा सकता है जिनमें दो महत्वपूर्ण रूप निम्नलिखित हैः-
1. जैट्रोफा पौधे का बाड़ के रूप में प्रयोग।
2. जैट्रोफा का नर्सरी के रूप में प्रयोग।
जैविक ईंधन के लिए जैट्रोफा एक बेहतरीन विकल्प
1. जैट्रोफा का पौधा ऊसर, बंजर, शुष्क, अर्द्ध शुष्क पथरीली और अन्य किसी भी प्रकार की भूमि पर आसानी से उगाया जा सकता है। जलभराव वाली जमीन में इसको नहीं उगाया जा सकता है।
2. पौधे को जानवर नहीं खाते हैं और न ही पक्षी नुकसान पहुंचाते हैं जिससे इसकी देखभाल करने की भी आवश्यकता नहीं है।
3. जैट्रोफा का पौधा बहुत ही कम समय में बढ़कर तैयार हो जाता है और लगाने (रोपाई) के दो वर्ष में उत्पादन प्रारंभ कर देता है।
4. जैट्रोफा के पौधे को बार-बार लगाने (रोपाई) की आवश्यकता नहीं है। एक बार लगाने पर निरंतर 45-50 वर्षों तक फसल (बीज उत्पादन) प्राप्त होती रहती है।
5. जैट्रोफा के बीजों में अन्य पौधों के बीजों की तुलना में तेल की मात्रा भी अधिक होती है। इससे 35-40 प्रतिशत तेल प्राप्त होता है।
6. जैट्रोफा के पौधों को उगाने से वर्तमान खाद्यान्न फसलों का क्षेत्र भी प्रभावित नहीं होगा। इसे देश भर में उपलब्ध लाखों एकड़ बंजर व बेकार पड़ी भूमि में उगाया जा सकेगा।
7. जैट्रोफा की खेती मात्र बायोडीजल उत्पादन की दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि इसकी खेती से देश भर में बेकार पड़ी हुई बंजर भूमि का उपयोग कर उसे सुधारा भी जा सकेगा।
8. जैट्रोफा की खेती से बंजर भूमि का कटाव रोका जा सकेगा, साथ ही यह पारिस्थितिकी तंत्र और जैव-विविधता को बचाने में भी महत्वपूर्ण योगदान करेगा।
9. इसके पौधे को खेत की मेड़ों (मुंडेरों) पर लगाने से यह उत्पादन के साथ-साथ बाड़ का काम करेगा।
10. जैट्रोफा की खेती से गरीब और सीमांत किसानों तथा समाज के अन्य कमजोर वर्गों को खासतौर से गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले लोगों और महिलाओं को ग्रामीण/स्थानीय स्तर पर रोजगार और कमाई के अवसर प्राप्त होंगे।
11. इसकी खेती जिस भूमि में होगी उस भूमि को दीमक व व्हाइट ग्रब (सफेद लट्) की समस्या से पूर्ण छुटकारा मिल सकेगा।





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